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बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

राजिया रा सौरठा -5

कृपाराम पर द्वारा लिखित राजिया के नीति सम्बन्धी दोहे |

मानै कर निज मीच, पर संपत देखे अपत |
निपट दुखी व्है नीच , रीसां बळ-बळ राजिया ||

नीच व्यक्ति जब दुसरे की सम्पति को देखता है तो उसे अपनी मृत्यु समझता है,इसलिए ऐसा निकृष्ट व्यक्ति मन में जल-जल कर बहुत दुखी होता है |

खूंद गधेडा खाय, पैलां री वाडी पडे |
आ अणजुगति आय , रडकै चित में राजिया ||

यदि परायी बाड़ी में गधे घुस कर उसे रोंदते हुए खाने लगे, तब भी हे राजिया ! यह अयुक्त बात है जो मन में अवश्य खटकती है |

नारी दास अनाथ, पण माथै चाढयां पछै |
हिय ऊपरलौ हाथ, राल्यो जाय न राजिया ||

नारी और दास अनाथ होते है ( इसीलिय इन दोनों को स्वामी की जरुरत होती है ) किन्तु एक बार इन्हें सिर पर चढा लेने से ये छाती-ऊपर का हाथ बन जाते है जिसे हटाना आसान नहीं होता |

हियै मूढ़ जो होय. की संगत ज्यांरी करै |
काला ऊपर कोय, रंग न लागै राजिया ||

जो व्यक्ति जन्म-जात मुर्ख होते है, उन पर सत् संगति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, हे राजिया ! जैसे काले रंग पर कोई अन्य रंग नहीं चढ़ता |

मलियागिर मंझार , हर को तर चनण हुवै |
संगत लियै सुधार, रुन्खां ही नै राजिया ||

मलयागिरि पर प्रत्येक पेड़ चन्दन हो जाता है , हे राजिया ! यह अच्छी संगति का ही प्रभाव है , जो वृक्षो तक को सुधार देता है |

पिंड लछण पहचाण, प्रीत हेत कीजे पछै |
जगत कहे सो जाण, रेखा पाहण राजिया ||

किसी भी व्यक्ति से प्रेम व घनिष्ठता स्थापित करने से पहले उसके व्यक्तित्व की पूरी जानकारी कर लेनी चाहिय | यह लोक मान्यता पत्थर पर खिंची लकीर की भांति सही है |

ऊँचे गिरवर आग, जलती सह देखै जगत |
पर जलती निज पाग , रती न दिसै राजिया ||

ऊँचे पहाडो पर लगी आग तो सारा संसार देखता है ,परन्तु हे राजिया ! अपने सिर पर जलती हुयी पगड़ी कोई नहीं देखता | अर्थात दूसरो में दोष देखना बहुत आसान है किन्तु कोई अपने दोष नहीं देखता |

सुण प्रस्ताव सुभाय, मन सूं यूँ भिडकै मुगध |
ज्यूँ पुरबीयौ जाय , रती दिखायां राजिया ||

मुग्धा ( काम-चेष्ठा रहित युवा स्त्री ) नायिका रतिप्रस्ताव सूनकर इस प्रकार चौंक कर भागती है जैसे चिरमी दिखाने पर रंगास्वामी |

जिण बिन रयौ न जाय, हेक घडी अळ्गो हुवां |
दोस करै विण दाय, रीस न कीजे राजिया ||

जिस व्यक्ति के घड़ी भर अलग होने पर भी रहा नही जाय , एसा ममत्व वाला व्यक्ति यदि कोइ ग़लती करे तो उसका बुरा नहीं मानना चाहिय |

समर सियाळ सुभाव , गळियां रा गाहिड़ करै |
इसडा तो उमराव, रोट्याँ मुहंगा राजिया ||

जिन लोगों का युद्ध में तो गीदड़ का सा स्वभाव हो किन्तु महफ़िल गोष्ठियों में अपनी बहादुरी की बातें करे , हे राजिया ! ऐसे सरदार (उमराव) तो रोटियों के बदले भी महंगे पड़ते है |

कही न माने काय, जुगती अणजुगती जगत |
स्याणा नै सुख पाय, रहणों चुप हुय राजिया ||

जहाँ लोग कही हुयी उचित-अनुचित बात को नहीं मानते हों वहां समझदार व्यक्ति को चुप ही रहना चाहिय, इसी में सार है |

पाटा पीड उपाव , तन लागां तरवारियां |
वहै जीभ रा घाव, रती न ओखद राजिया ||

शरीर पर तलवार के लगे घाव तो मरहम पट्टी आदि के इलाज से ठीक हो सकते है किन्तु हे राजिया ! कटु वचनों से हुए घाव को भरने की कोई ओषधि नहीं है |
डा. शक्तिदान कविया द्वारा लिखित पुस्तक "राजिया रा सौरठा" से साभार |

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